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लोकसभा में वंदे मातरम् पर बहस, DMK सांसद ए. राजा बोले—‘गीत मुसलमानों के खिलाफ भी इस्तेमाल हुआ’

लोकसभा में सोमवार को वंदे मातरम् पर हुई बहस के दौरान DMK सांसद ए. राजा ने यह कहते हुए विवाद खड़ा कर दिया कि यह गीत इतिहास में न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ, बल्कि मुसलमानों को अलग करने के लिए भी इस्तेमाल किया गया था।

राजा ने कहा कि 20वीं सदी की शुरुआत में वंदे मातरम् को इस तरह पेश किया गया कि इससे मुसलमानों को अलग महसूस कराया जाए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा और कहा कि वे तुष्टिकरण की बात करते हैं लेकिन वंदे मातरम् पर हुए “तुष्टिकरण” की बात नहीं करते।


PM को घेरा, गांधी के बयान का भी दिया हवाला

ए. राजा ने कहा कि—

  • “प्रधानमंत्री कहते हैं कि वंदे मातरम् को काटा गया जिसने विभाजन के बीज बोए, लेकिन विभाजन आपके पूर्वजों ने किया, मुसलमानों ने नहीं।”
  • महात्मा गांधी ने 1915 में गीत की प्रशंसा की थी, लेकिन 1940 में कहा था कि इसे मुसलमानों को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं गाया जाना चाहिए

राजा का दावा—गीत का इस्तेमाल सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में हुआ

राजा ने कहा कि 1905–1908 के दौरान बंगाल में—

  • मस्जिदों के पास से गुजरने वाले जुलूस वंदे मातरम् का नारा लगाते थे,
  • जिससे सांप्रदायिक तनाव पैदा होता था।
    उन्होंने दावा किया कि 1907 में पर्चे बाँटे गए जिनमें कहा गया कि मुसलमानों को वंदे मातरम् नहीं गाना चाहिए और वे स्वदेशी आंदोलन में शामिल न हों।

उन्होंने कहा कि हाउस ऑफ कॉमन्स में भी उस समय इस बात पर बहस हुई थी कि वंदे मातरम् से सांप्रदायिक टकराव क्यों पैदा हो रहा है।


‘कुछ छंद मुसलमानों के खिलाफ हैं’—ए. राजा

राजा ने इतिहासकार तानिका सरकार और आर.सी. मजूमदार का हवाला देते हुए कहा कि:

  • ‘आनंद मठ’ में ऐसे संदर्भ हैं जो मुसलमानों को बाहर करने की सोच दिखाते हैं।
  • बंकिम चंद्र ने “देशभक्ति को धर्म में और धर्म को देशभक्ति में बदल दिया।”

उन्होंने कहा कि इसलिए यह मानने के कारण हैं कि वंदे मातरम् के कुछ छंद मुसलमानों के खिलाफ भी हैं, और इसकी आलोचना 20वीं सदी की शुरुआत से की जा रही है।

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