जीजा की डिग्री पर 3 साल से नौकरी कर रहा था कार्डियोलॉजिस्ट, बहन ने किया पर्दाफाश

उत्तर प्रदेश के ललितपुर मेडिकल कॉलेज से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ कार्डियोलॉजिस्ट के पद पर नियुक्त एक डॉक्टर पिछले तीन वर्षों से अपने जीजा डॉ. राजीव जैन की डिग्री का इस्तेमाल कर संविदा पर नौकरी कर रहा था। पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब उसकी अमेरिका में रहने वाली बहन डॉ. सोनाली सिंह ने संपत्ति विवाद के चलते लिखित शिकायत की। शिकायत करने वाली सोनाली आरोपी डॉक्टर की सगी बहन हैं।
संपत्ति विवाद से खुला राज, बहन ने लगाए गंभीर आरोप
डॉ. सोनाली सिंह ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि उनके पति डॉ. राजीव जैन की मेडिकल डिग्री का गलत इस्तेमाल करते हुए डॉ. अभिनव गुप्ता ललितपुर मेडिकल कॉलेज में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में नौकरी कर रहा है।
महिला ने इसके समर्थन में फोटो मिलान, दस्तावेज़ और अन्य प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं तथा सत्यापन की मांग की है।
आरोपी डॉक्टर ने शिकायत मिलते ही दिया इस्तीफा
सूत्रों के अनुसार, शिकायत की जानकारी होते ही आरोपी डॉ. अभिनव गुप्ता ने मेडिकल कॉलेज में अपनी संविदा नौकरी से स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया। यह भी सामने आया है कि आरोपी ने रुड़की से आईटीआई की डिग्री भी हासिल कर रखी है, जो उसके मेडिकल क्वालिफिकेशन पर और सवाल खड़े करती है।
मेडिकल कॉलेज का पक्ष: मरीजों पर खतरा नहीं बताया
ललितपुर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. मयंक शुक्ला ने कहा कि आरोपी डॉक्टर डिप्लोमा धारक था, जिसे CCU (क्रिटिकल केयर यूनिट) के लिए रखा गया था।
वे बताते हैं:
- वह हेड ऑफ डिपार्टमेंट के अधीन काम करता था
- सिर्फ रूटीन जांच से जुड़े काम करता था
- किसी भी प्रकार का सेंसिटिव या हाई-रिस्क मेडिकल केस उसे नहीं सौंपा गया था
प्रिंसिपल ने दावा किया कि इस वजह से किसी मरीज को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।
जांच के लिए तीन डॉक्टरों की टीम गठित
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने बताया कि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए तीन डॉक्टरों की विशेष जांच टीम गठित की गई है।
CMO के अनुसार:
- जांच रिपोर्ट आने के बाद एफआईआर दर्ज की जाएगी
- चयन समिति की भूमिका और भर्ती प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं
- यह भी जांच होगी कि फर्जी दस्तावेज़ कैसे स्वीकार किए गए और सत्यापन क्यों नहीं किया गया
भर्ती प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
मामला सामने आने के बाद अब मेडिकल कॉलेज की चयन प्रणाली कटघरे में है।
सबसे बड़ा सवाल यह है:
- फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी कैसे मिली?
- दस्तावेज़ों का सख्त सत्यापन क्यों नहीं किया गया?
- यह धोखाधड़ी तीन साल तक कैसे चली?
यह मामला मेडिकल संस्थानों में होने वाली भर्ती प्रक्रिया और निगरानी प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।


