वोटर लिस्ट से विधायक के भाई समेत पूरा परिवार गायब, SIR प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया अब मतदाता सूची में सुधार के बजाय “गायब लिस्ट” बनती नजर आ रही है। जहां नाम जुड़ने चाहिए थे, वहां नाम काटे जा रहे हैं।
ताजा मामला इतना चौंकाने वाला है कि एक बीजेपी विधायक के सगे भाई, जो खुद ग्राम प्रधान हैं, उनका ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का नाम मतदाता सूची से गायब हो गया है।
हाटा तहसील के रामपुर सोहरौना गांव का मामला
यह मामला हाटा तहसील के सुकरौली विकासखंड स्थित रामपुर सोहरौना गांव का है। यही गांव हाटा से बीजेपी विधायक मोहन वर्मा का पैतृक गांव भी है।
विधायक के भाई राजेंद्र वर्मा यहां के ग्राम प्रधान हैं, लेकिन नई मतदाता सूची में
- ग्राम प्रधान
- उनकी पत्नी
- और बेटे
तीनों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं।
प्रथम मतदाता सूची जारी होते ही मचा हड़कंप
जैसे ही प्रथम मतदाता सूची प्रकाशित हुई, गांव में हड़कंप मच गया। नाम कटने की सूचना मिलते ही बीएलओ और ग्राम सचिव ने आनन-फानन में बैठक बुला ली।
अब गांव में चर्चा चुनाव की नहीं, बल्कि इस बात की है कि SIR प्रक्रिया में विधायक के भाई के परिवार का नाम कैसे गायब हो गया।
घंटों माथापच्ची, पर रहस्य अब भी बरकरार
सूचना मिलने पर बड़ी संख्या में ग्रामीण भी मौके पर पहुंच गए।
घंटों की जांच और चर्चा के बावजूद यह साफ नहीं हो सका कि
- नाम किसने काटा
- कैसे काटा
- और क्यों काटा
बीएलओ भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके।
ग्राम प्रधान का आरोप: 100 से ज्यादा नाम गायब
ग्राम प्रधान राजेंद्र वर्मा ने कहा,
“सिर्फ मेरा ही नहीं, मेरी पत्नी और बच्चे का नाम भी वोटर लिस्ट से गायब है। गांव में 100 से ज्यादा लोगों के नाम काट दिए गए हैं। यह बेहद गंभीर मामला है और सभी नाम तुरंत जोड़े जाने चाहिए।”
विधायक मोहन वर्मा बोले: साजिश हुई तो होगी कार्रवाई
मामले ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब बीजेपी विधायक मोहन वर्मा का बयान सामने आया।
उन्होंने कहा,
“मेरी डीएम और बीडीओ से बात हो गई है। जल्द सुधार कराया जाएगा। अगर यह किसी साजिश के तहत किया गया है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।”विधायक ने स्पष्ट किया कि वे इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं।
तकनीकी गड़बड़ी या राजनीतिक साजिश?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि
- यह तकनीकी गड़बड़ी है
- या फिर राजनीतिक साजिश के तहत नाम काटे गए हैं?
यह मामला SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अगर एक ग्राम प्रधान और विधायक के भाई का नाम ही हट सकता है, तो आम मतदाताओं के नाम कितने सुरक्षित हैं, यह बड़ा सवाल बन गया है।


