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पान मसाला पर नहीं लगी रोक, सरकार की नजर अब उसकी…

देश की राजधानी दिल्ली में पान मसाला और गुटखा को लेकर एक अहम उच्च-स्तरीय बैठक हुई, लेकिन इस बैठक में न तो पान मसाला बंद करने का फैसला लिया गया और न ही गुटखे पर कोई नई रोक लगाई गई

बैठक का पूरा फोकस केवल एक मुद्दे पर रहा —
पान मसाला और गुटखा जिस पन्नी (सैशे पैकिंग) में बिकते हैं, वह पर्यावरण के लिए गंभीर संकट क्यों बन चुकी है और इसका विकल्प क्या हो सकता है।


मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार की अध्यक्षता में हुई बैठक

यह उच्च-स्तरीय बैठक भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद की अध्यक्षता में आयोजित की गई।

इसमें शामिल हुए—

  • पर्यावरण मंत्रालय
  • खाद्य सुरक्षा विभाग (FSSAI)
  • उद्योग प्रतिनिधि
  • मानक निर्धारण संस्था BIS
  • वैज्ञानिक संस्थान
  • IITs और निजी कंपनियां

एजेंडा बिल्कुल स्पष्ट था —
पान मसाला और गुटखा की सैशे पैकिंग में इस्तेमाल हो रहे प्लास्टिक का टिकाऊ विकल्प खोजना।


गुटखा की पन्नी बन चुकी है सबसे बड़ी समस्या

बैठक की शुरुआत में प्रो. अजय कुमार सूद ने कहा कि यह विषय पहले भी:

  • प्रधानमंत्री कार्यालय
  • उपभोक्ता मामलों के विभाग

के साथ उठाया जा चुका है।

उन्होंने साफ कहा कि अब केवल रिसर्च और पायलट प्रोजेक्ट से काम नहीं चलेगा, बल्कि समयबद्ध एक्शन प्लान की जरूरत है, क्योंकि गुटखा की पन्नियां आज देश के प्लास्टिक कचरे की सबसे जिद्दी समस्या बन चुकी हैं।


रिसायकल नहीं हो पाती सैशे पैकिंग

बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सचिव राजेश गोखले ने बताया कि:

  • सैशे प्लास्टिक न गलता है
  • न रिसायकल हो पाता है
  • न कलेक्शन सिस्टम में फिट बैठता है

इसी वजह से यह:

  • गलियों
  • नालियों
  • खेतों
  • नदियों

तक फैल चुका है।

उन्होंने PLA (Poly Lactic Acid) को संभावित विकल्प बताया और कहा कि सरकार–उद्योग–वैज्ञानिक संस्थान मिलकर इसे व्यवहारिक बना सकते हैं।


बायोप्लास्टिक की परिभाषा ही स्पष्ट नहीं

हालांकि पर्यावरण मंत्रालय ने इस पर तकनीकी चेतावनी दी।

मंत्रालय के सचिव तनमय कुमार ने कहा कि फिलहाल सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि बायोप्लास्टिक की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा मौजूद नहीं है

जब तक यह तय नहीं होगा कि—

  • कौन सा मटेरियल सच में biodegradable है
  • और कौन केवल नाम का

तब तक नियम बनाना संभव नहीं होगा।

अब मंत्रालय इस परिभाषा को दोबारा तय करने की प्रक्रिया में है, ताकि आगे BIS मानक टेस्टिंग सिस्टम बना सके।


FSSAI ने रखीं सख्त शर्तें

खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर FSSAI के CEO राजित पुनहानी ने साफ कहा कि नया पैकेजिंग मटेरियल:

  • खाने के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो
  • पान मसाले के स्वाद और खुशबू को खराब न करे
  • migration limits का पालन करे
  • उत्पाद से ज्यादा महंगा न हो
  • किसी भी लेयर में प्लास्टिक या एल्यूमिनियम फॉयल न हो

इन शर्तों के बिना कोई विकल्प मंजूर नहीं होगा।


BIS की चेतावनी: नया समाधान भी नई समस्या बन सकता है

Bureau of Indian Standards (BIS) ने चेताया कि ज्यादातर बायोडिग्रेडेबल मटेरियल:

  • सिर्फ industrial composting में गलते हैं
  • सड़क या नाली में फेंके जाने पर वर्षों तक पड़े रहते हैं

यानी अगर कलेक्शन और प्रोसेसिंग सिस्टम मजबूत नहीं हुआ, तो नई पैकिंग भी पुरानी समस्या का नया रूप बन सकती है।


IITs और कंपनियों ने पेश किए समाधान

बैठक में:

  • IIT मद्रास
  • IIT बॉम्बे
  • Ravenshaw University

के वैज्ञानिकों ने तकनीकी सुझाव दिए।

वहीं Balrampur Chini Mills, Praj Industries और UKHI जैसी कंपनियों ने दावा किया कि उनके पास बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग समाधान मौजूद हैं।

लेकिन सभी इस बात पर सहमत दिखे कि अब इन्हें:

  • लैब से बाहर
  • वैज्ञानिक परीक्षण
  • सर्टिफिकेशन

के चरण में लाना जरूरी है।


अगली बैठक से पहले SOP तैयार करने के निर्देश

बैठक के अंत में प्रो. अजय कुमार सूद ने निर्देश दिए कि:

  • उद्योग अपने पैकेजिंग सैंपल CIPET को भेजें
  • उनका परीक्षण कराया जाए
  • अगली बैठक से पहले Standard Operating Procedure (SOP) तैयार की जाए

साथ ही MoEFCC, FSSAI, BIS, CIPET और IIP को मिलकर स्पष्ट प्रक्रिया और समयसीमा तय करने को कहा गया।


पान मसाला बिकता रहेगा, पन्नी पर सवाल कायम

पूरी बैठक में एक बात साफ रही —
किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि पान मसाला क्यों बिक रहा है।

सरकार की लड़ाई आदत से नहीं, बल्कि कचरे से है।
निशाने पर पान मसाला नहीं, बल्कि उसकी प्लास्टिक पन्नी है।

यानी—

ज़ुबान का स्वाद अपनी जगह,
धरती की सेहत अपनी जगह।

फिलहाल देश में पान मसाला बिकता रहेगा, लेकिन उसकी पन्नी का भविष्य अब अनिश्चित नजर आ रहा है।

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