इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी: सहमति से लंबे संबंध रेप नहीं, आरोपी को मिली अग्रिम जमानत

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेप के एक मामले में सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बालिगों के बीच यदि लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों, तो उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की सिंगल बेंच ने उस समय की, जब आजमगढ़ के सिधारी थाने में दर्ज एक रेप केस में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी। अदालत ने सभी तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि मामले में दर्ज बयानों और FIR के तथ्यों में विरोधाभास है। अदालत के अनुसार, पीड़िता और आरोपी के बीच लंबे समय से आपसी सहमति से संबंध होने के संकेत मिलते हैं, जिससे प्रथम दृष्टया बलात्कार का मामला कमजोर प्रतीत होता है।
आरोपी की दलील
सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने दावा किया कि उसे झूठे आरोपों में फंसाया गया है। वकील ने कहा कि यह मामला सहमति से बने संबंधों का है, न कि बलात्कार का। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
पीड़िता का पक्ष
वहीं, सरकारी पक्ष ने आरोप लगाया कि आरोपी ने दबाव और बंदूक की नोक पर अपराध किया। हालांकि, अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान और FIR में कई तथ्यों का मेल नहीं है।
जमानत का आदेश
सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की शुरुआती जांच में अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा होता है। इसके आधार पर अदालत ने आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी, साथ ही उसे जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया।
निष्कर्ष
यह फैसला एक बार फिर इस बहस को जन्म देता है कि सहमति और आरोपों के बीच कानूनी सीमा कैसे तय की जाए। मामला अभी जांच के अधीन है और अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा



