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RBI का बड़ा फैसला: रेपो रेट 5.25% पर स्थिर, विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए 7 बड़े बदलाव

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को अपनी मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बिना किसी बदलाव के बनाए रखा है। केंद्रीय बैंक ने इस बार न्यूट्रल रुख अपनाते हुए मुख्य फोकस विदेशी निवेश को भारत में बढ़ाने पर रखा है।

RBI के अनुसार, भारत के वित्तीय बाजारों को और अधिक आकर्षक बनाने तथा विदेशी पूंजी प्रवाह को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार किए गए हैं।

विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की बड़ी पहल

इस पॉलिसी मीटिंग में RBI ने कुल 7 बड़े फैसले लिए हैं, जिनका उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए भारत के डेट और इक्विटी बाजारों को और आसान बनाना है।

1. कैपिटल गेन टैक्स में राहत

1 अप्रैल 2026 से सरकारी सिक्योरिटीज में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स समाप्त कर दिया जाएगा। फिलहाल 12 महीने से अधिक होल्डिंग पर 12.5% टैक्स लागू है।

2. G-Sec मार्केट में विदेशी पहुंच बढ़ी

RBI ने 15, 30 और 40 साल की सरकारी सिक्योरिटीज को Fully Accessible Route (FAR) में शामिल किया है। इससे विदेशी निवेशकों की पहुंच भारतीय सॉवरेन डेट मार्केट तक और आसान हो जाएगी।

3. FPI निवेश सीमा से राहत

जनरल रूट के तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) पर लगी कंसंट्रेशन लिमिट हटा दी गई है। इससे विदेशी निवेशकों को डेट मार्केट में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी।

4. NRI और OCI निवेश नियम आसान

अब नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRI) और ओवरसीज सिटिजन्स ऑफ इंडिया (OCI) को SEBI रजिस्ट्रेशन के बिना लिस्टेड इक्विटी में अधिक निवेश की अनुमति दी गई है।

5. PSU के लिए ECB सुविधा बढ़ी

पब्लिक सेक्टर कंपनियों के लिए एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) पर फॉरेक्स स्वैप विंडो को 30 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

6. FCNR(B) डिपॉजिट पर राहत

3 से 5 साल की अवधि वाले FCNR(B) डिपॉजिट के लिए हेजिंग कॉस्ट सपोर्ट को भी 2026 तक बढ़ा दिया गया है, जिससे बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना आसान होगा।

7. एक्सपोर्ट कमाई पर नया नियम

एक्सपोर्टर्स को अब अपनी विदेशी कमाई 15 महीने की जगह 9 महीने के भीतर भारत वापस लानी होगी, जिससे विदेशी मुद्रा प्रवाह तेज होगा।

विदेशी निवेश पर RBI का फोकस

इन सभी फैसलों का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाना, वित्तीय बाजारों को मजबूत करना और रुपये को स्थिर बनाए रखना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन सुधारों से भारत के बॉन्ड और इक्विटी बाजारों में विदेशी निवेशकों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

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