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	<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट Archives - Newj9</title>
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	<link>https://newj9.com/archives/tag/इलाहाबाद-हाईकोर्ट</link>
	<description>Hindi News, Lifestyle &#38; Entertainment Articles</description>
	<lastBuildDate>Thu, 18 Dec 2025 12:04:33 +0000</lastBuildDate>
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		<title>दुष्कर्म पीड़िताओं के गर्भपात में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, स्वतः संज्ञान लेकर सुओ मोटो याचिका दर्ज</title>
		<link>https://newj9.com/archives/150898</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Newj9]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Dec 2025 12:04:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं के गर्भपात से जुड़े मामलों में हो रही अनावश्यक देरी को गंभीर मुद्दा मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट ने इसे महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि पीड़िताओं के मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न करार दिया है। इसी के तहत हाईकोर्ट ने इस विषय पर सुओ मोटो &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं के गर्भपात से जुड़े मामलों में हो रही अनावश्यक देरी को गंभीर मुद्दा मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट ने इसे महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि पीड़िताओं के <strong>मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न</strong> करार दिया है। इसी के तहत हाईकोर्ट ने इस विषय पर <strong>सुओ मोटो जनहित याचिका</strong> दर्ज कर विस्तृत सुनवाई शुरू की है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दुष्कर्म पीड़िताओं के गर्भपात मामलों में कई स्तरों पर प्रक्रियात्मक अड़चनें सामने आती हैं। मेडिकल बोर्ड के गठन में देरी, प्रशासनिक अनुमति में विलंब और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव के कारण पीड़िताओं को समय पर जरूरी चिकित्सा सहायता नहीं मिल पाती। इसका सीधा असर उनके शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है, जो बेहद चिंताजनक है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>संवेदनशील मामलों में देरी पर नाराजगी</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में थोड़ी सी भी देरी पीड़िता के लिए गंभीर और अपरिवर्तनीय परिणाम ला सकती है। अदालत ने कहा कि गर्भपात से जुड़े मामलों में समय का अत्यधिक महत्व होता है, लेकिन व्यवहार में प्रक्रियाएं इतनी जटिल हैं कि पीड़िताओं को लंबा इंतजार करना पड़ता है। कोर्ट ने इसे मानवीय दृष्टिकोण की कमी बताया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अधिकारियों को संवेदनशील बनाने की जरूरत</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">खंडपीठ ने कहा कि केवल कानूनी औपचारिकताओं का पालन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों और चिकित्सा तंत्र को भी ऐसे मामलों में संवेदनशील बनने की आवश्यकता है। कोर्ट ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे स्पष्ट और प्रभावी दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए, ताकि दुष्कर्म पीड़िताओं को गर्भपात के लिए अनावश्यक कानूनी और प्रशासनिक बाधाओं का सामना न करना पड़े।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>न्याय मित्र नियुक्त, अगली सुनवाई 13 जनवरी को</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मामले में अदालत की सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता <strong>महिमा मौर्य</strong> को न्याय मित्र नियुक्त किया गया है। न्याय मित्र कोर्ट के समक्ष तथ्यात्मक स्थिति, कानूनी प्रावधानों और सुधारात्मक सुझावों को प्रस्तुत करेंगे। हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई <strong>13 जनवरी</strong> को तय की है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कोर्ट को उम्मीद है कि इस पहल के जरिए दुष्कर्म पीड़िताओं के गर्भपात मामलों में <strong>समयबद्ध, संवेदनशील और मानवीय प्रक्रिया</strong> सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।</p>
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		<item>
		<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौरव गुप्ता की भरण-पोषण याचिका खारिज की</title>
		<link>https://newj9.com/archives/149622</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Newj9]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Oct 2025 10:25:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौरव गुप्ता की परिवार न्यायालय द्वारा तय गुजारा भत्ते के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। गौरव गुप्ता ने पत्नी रितिका गुप्ता और बेटी के लिए 40 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण के आदेश को चुनौती दी थी। पति की दलील गौरव गुप्ता ने दावा किया कि &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph">इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौरव गुप्ता की <strong>परिवार न्यायालय द्वारा तय गुजारा भत्ते</strong> के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। गौरव गुप्ता ने पत्नी <strong>रितिका गुप्ता</strong> और बेटी के लिए <strong>40 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण</strong> के आदेश को चुनौती दी थी।</p>



<h3 class="wp-block-heading">पति की दलील</h3>



<p class="wp-block-paragraph">गौरव गुप्ता ने दावा किया कि वे एक कंपनी के निदेशक हैं, लेकिन कंपनी घाटे में चल रही है। उनकी तर्क थी कि उनकी वार्षिक आय लगभग <strong>2.40 लाख रुपये</strong> (20 हजार प्रति माह) है। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी <strong>उच्च शिक्षित हैं और इंटीरियर डिजाइनिंग में डिग्रीधारक हैं</strong>, इसलिए उनसे भी कमाने की अपेक्षा की जानी चाहिए।</p>



<h3 class="wp-block-heading">पत्नी की दलील</h3>



<p class="wp-block-paragraph">रितिका गुप्ता ने अदालत को बताया कि वे वर्तमान में अपनी छोटी बेटी की देखभाल में व्यस्त हैं और <strong>आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं।</strong> उन्होंने कहा कि उन्हें बच्चे के पालन-पोषण और अपनी जरूरतों के लिए उचित भरण-पोषण की आवश्यकता है।</p>



<h3 class="wp-block-heading">अदालत का फैसला</h3>



<p class="wp-block-paragraph">हाईकोर्ट ने कहा कि <strong>शिक्षित होने या पूर्व में नौकरी करने से पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार समाप्त नहीं होता।</strong> सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के हवाले से अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि विवाहिता पत्नी वास्तविक रूप से निर्भर है, तो उसे भरण-पोषण का पूरा अधिकार है।</p>



<h3 class="wp-block-heading">पति की आय छिपाने की कोशिश</h3>



<p class="wp-block-paragraph">कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि पति ने अपनी वास्तविक आय को छिपाने की कोशिश की। यदि कंपनी घाटे में थी, तो यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उसके माता-पिता, जो कंपनी के निदेशक भी हैं, उनका वेतन कैसे बढ़ गया। अदालत ने इसे जानबूझकर भरण-पोषण से बचने की कोशिश करार दिया।</p>



<h3 class="wp-block-heading">अदालत का निष्कर्ष</h3>



<p class="wp-block-paragraph">न्यायमूर्ति <strong>मदान पाल सिंह</strong> की एकलपीठ ने कहा—</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="wp-block-paragraph">“एक सक्षम और स्वस्थ व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने योग्य आय अर्जित करे।”</p>
</blockquote>



<p class="wp-block-paragraph">परिवार न्यायालय के <strong>40 हजार मासिक भरण-पोषण</strong> के आदेश को हाईकोर्ट ने सही ठहराया और गौरव गुप्ता की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।</p>
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		<item>
		<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल मस्जिद मामले में मस्जिद कमेटी को झटका, याचिका खारिज</title>
		<link>https://newj9.com/archives/149453</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Newj9]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Oct 2025 11:06:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल जिले में तालाब और सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद के मामले में मस्जिद कमेटी को झटका दिया है। कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वे अपनी अपील ट्रायल कोर्ट में दाखिल करें। सिंगल बेंच ने अर्जेंट सुनवाई की अर्जेंट बेंच में जस्टिस दिनेश पाठक की सिंगल बेंच &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने <strong>संभल जिले में तालाब और सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद</strong> के मामले में मस्जिद कमेटी को झटका दिया है। कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वे अपनी अपील <strong>ट्रायल कोर्ट में</strong> दाखिल करें।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>सिंगल बेंच ने अर्जेंट सुनवाई की</strong></h3>



<p class="wp-block-paragraph">अर्जेंट बेंच में <strong>जस्टिस दिनेश पाठक</strong> की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई की। मस्जिद शरीफ गोसुलबारा रावां बुजुर्ग और उनके मुतवल्ली मिंजर की ओर से दाखिल याचिका में <strong>ध्वस्तीकरण आदेश पर रोक</strong> लगाने की मांग की गई थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मस्जिद कमेटी की ओर से अधिवक्ता <strong>अरविंद कुमार त्रिपाठी</strong> और <strong>शशांक श्री त्रिपाठी</strong> ने पक्ष रखा। याचिका में दावा किया गया कि बिना ध्वस्तीकरण आदेश के प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>संभल प्रशासन ने 2 अक्टूबर को बुल्डोजर कार्रवाई शुरू की</strong></h3>



<p class="wp-block-paragraph">2 अक्टूबर को <strong>गांधी जयंती और दशहरा</strong> के दिन संभल प्रशासन ने बुलडोजर कार्रवाई की, जिसमें <strong>बारात घर को तालाब की जमीन पर अवैध निर्माण</strong> मानते हुए ध्वस्त किया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मस्जिद का भी कुछ हिस्सा सरकारी जमीन पर होने का दावा किया गया। मस्जिद कमेटी ने खुद अवैध हिस्से को <strong>हथौड़े से तोड़ने</strong> की प्रक्रिया शुरू की थी। याचिका में दलील दी गई कि बुलडोजर कार्रवाई के दौरान भीड़ जमा होने से <strong>हादसा या बवाल</strong> हो सकता था, लेकिन प्रशासन ने इसे नजरअंदाज किया।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>कोर्ट ने मस्जिद कमेटी की याचिका खारिज की</strong></h3>



<p class="wp-block-paragraph">कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुनाया। राज्य सरकार की ओर से <strong>चीफ स्टैंडिंग काउंसिल जे एन मौर्या</strong> और <strong>स्टैंडिंग काउंसिल आशीष मोहन श्रीवास्तव</strong> ने तर्क दिया कि जमीन <strong>सरकारी और तालाब की</strong> है, जहां अवैध निर्माण हुआ है।हाईकोर्ट ने मस्जिद पक्ष को <strong>ट्रायल कोर्ट में अपील करने</strong> का निर्देश दिया और <strong>अंतरिम रोक लगाने से इनकार</strong> कर दिया।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>पक्षकार और आरोप</strong></h3>



<p class="wp-block-paragraph">मस्जिद कमेटी ने याचिका में <strong>प्रदेश सरकार, डीएम संभल, एसपी संभल, एडीएम, तहसीलदार और ग्राम सभा</strong> को पक्षकार बनाया।</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>मस्जिद कमेटी का आरोप: बिना <strong>उचित नोटिस</strong> ध्वस्तीकरण शुरू किया गया।</li>



<li>प्रशासन का कहना: कार्रवाई <strong>कानूनी प्रक्रिया</strong> के तहत हुई।</li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph">हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए <strong>निचली अदालत को आगे की कार्रवाई का निर्देश</strong> दिया।</p>
<p>The post <a href="https://newj9.com/archives/149453">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल मस्जिद मामले में मस्जिद कमेटी को झटका, याचिका खारिज</a> appeared first on <a href="https://newj9.com">Newj9</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: &#8220;पाकिस्तान का समर्थन करना अपने आप में अपराध नहीं&#8221;</title>
		<link>https://newj9.com/archives/148348</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Newj9]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2025 10:35:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रयागराज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर केवल पाकिस्तान के समर्थन में पोस्ट करता है, लेकिन उसमें भारत विरोधी कोई सीधा संदर्भ नहीं है, तो इसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी करते हुए &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्रयागराज, </strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर केवल पाकिस्तान के समर्थन में पोस्ट करता है, लेकिन उसमें भारत विरोधी कोई सीधा संदर्भ नहीं है, तो इसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने <strong>18 वर्षीय छात्र रियाज</strong> को <strong>सशर्त ज़मानत</strong> दे दी। रियाज पर आरोप था कि उसने इंस्टाग्राम पर लिखा—</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="wp-block-paragraph">“चाहे जो हो जाय, सपोर्ट तो बस पाकिस्तान का करेंगे।”</p>
</blockquote>



<p class="wp-block-paragraph">इस पोस्ट को आधार बनाकर उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था और वह <strong>25 मई से जेल में बंद</strong> था।</p>



<h3 class="wp-block-heading">कोर्ट ने क्या कहा?</h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल</strong> की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि—</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>आरोपी की पोस्ट में <strong>भारत, भारतीय प्रतीकों या राष्ट्रीय गरिमा के खिलाफ कोई सीधा उल्लेख नहीं</strong> है।</li>



<li>केवल पाकिस्तान के समर्थन को <strong>अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता</strong>, जब तक यह देश की <strong>एकता, अखंडता या संप्रभुता को खतरे में</strong> न डाले।</li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph">कोर्ट ने यह भी कहा कि—“भारतीय संविधान में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। जब तक कोई पोस्ट हिंसा, घृणा या विद्रोह को प्रेरित नहीं करती, तब तक उसे दंडनीय नहीं माना जा सकता।”</p>



<h3 class="wp-block-heading">राज्य सरकार ने जताई आपत्ति</h3>



<p class="wp-block-paragraph">राज्य सरकार की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि—</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>इस प्रकार की पोस्ट समाज में <strong>वैमनस्य और भ्रम फैलाने</strong> वाली हो सकती है।</li>



<li>यह <strong>अलगाववादी मानसिकता</strong> को बढ़ावा देती है।</li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph">हालांकि, कोर्ट ने <strong>सुप्रीम कोर्ट के ‘इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य’</strong> मामले का हवाला देते हुए कहा कि <strong>सोचने और बोलने की स्वतंत्रता पर किसी भी कार्रवाई से पहले गंभीरता से विचार जरूरी है।</strong></p>



<h3 class="wp-block-heading">जांच प्रक्रिया में खामी</h3>



<p class="wp-block-paragraph">अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा—</p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>धारा 196 BNS</strong> के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले <strong>धारा 173(3)</strong> के अनुसार <strong>प्रारंभिक जांच जरूरी थी</strong>, जो इस मामले में नहीं की गई।</li>
</ul>



<h3 class="wp-block-heading">सशर्त ज़मानत और चेतावनी</h3>



<p class="wp-block-paragraph">कोर्ट ने रियाज की—</p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>कम उम्र</strong>,</li>



<li><strong>पहली बार आरोपी बनना</strong>,</li>



<li>और <strong>चार्जशीट दाखिल हो जाने</strong> जैसे बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए उसे <strong>सशर्त ज़मानत</strong> दी।</li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph">साथ ही अदालत ने उसे हिदायत दी कि वह भविष्य में <strong>किसी भी आपत्तिजनक या भड़काऊ पोस्ट से परहेज करे।</strong></p>
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